Friday, August 18, 2017

ईशावास्योपनिषत् - अभंगवृत्तात

ईशावास्योपनिषत् - अभंगवृत्तात
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते |
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ||
हरिः ॐ
असे हेंही पूर्ण | असे तेंही पूर्ण | पूर्णातुनि पूर्ण | उपजते ||शान्ति-1||
पूर्णातुनि पूर्ण | जरि काढियेले | शेष जें राहतें | तेंही पूर्ण ||शान्ति-2||
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् |
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ||1||
जें जें जगीं "जगत्" | म्हणावेसे आहे | अणोरेणवी कीं | ईश्वरचि ||1||
अर्पण करूनी | उपभोग घ्यावा | धन कां कोणते | आपुलेच ||2||
कुर्वन्नेवेह कर्माणि | जिजीविषेच्छतं समाः |
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति | न कर्म लिप्यते नरे ||2||
शतकोत्तरी कां | जगावेसें वाटे | कर्मचि सर्वथा | करणेचे ||3||
ऐसेचि जीवन | पर्याय ना कांही | निर्लेप रहावें | कर्मी रत ||4||
असुर्या नाम ते लोकाः | अन्धेन तमसावृताः |
तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति | ये के चात्महनो जनाः ||3||
मोहांधकाराने | जग व्यापलेले | मोहांचे कशास | आकर्षण ||5||
तरीही मोहित | वागतात लोक | आत्मघातकी ही | वृत्ति तरी ||6||
अनेजदेकं मनसोजवीयः | नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत् |
तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत् | तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ||4||
सत्यप्रकाशाचा | वेग प्रकाशाचा | देवांनाही तें कां | समजले ||7||
जागीच राहून | पळत्यासी लांघी | जीव याचेवीण | जगतो कां ||8||
तदेजति तन्नैजति | तद्दूरे तद्वन्तिके |
तदन्तरस्य सर्वस्य | तदुसर्वस्यास्य बाह्यतः ||5||
कोठेही न जाई | थांबे ना कधीही | जवळीच आहे | दूर सुद्धा ||9||
सर्वांचे अंतरी | वास की याचाच | सर्वांसभोवती | हेंच आहे ||10||
यस्तु सर्वाणि भूतानि | आत्मन्येवावतिष्ठति |
सर्वभूतेषु चात्मानम् | ततो न विजुगुप्सते ||6||
भूतमात्र सारे | अपुलेच ठायी | सर्वांभूतीं पाहे | आपणासी ||11||
ऐसी जी कां स्थिति | साधीयेली ज्याने | जिंकावे हरावें | कोणासंगे ||12||
यस्मिन् सर्वाणि भूतानि | आत्मैवाभूत् विजानतः |
तत्र को मोहः कः शोकः | एकत्वमनुपश्यतः ||7||
भूतमात्र सारे | जरी आत्मरूप | भेट कीं वियोग | कोणासंगे ||13||
भूतमात्र सारे | जरी एकरूप | हरवतें काय | काय हवें ||14||
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम् | अस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् |
कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूर्- याथातथ्यतः |
अर्थान्व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ||8||
काव्यात्म होवोनी | गुह्यार्थ गमता | समानता सिद्ध | शाश्वतचि ||15||
तादात्म्य निष्पाप | शुभ्र निर्गुणाशी | स्वयंभू विशुद्ध | निष्कलंक ||16||
अन्धं तमः प्रविशन्ति | येऽविद्यामुपासते |
ततो भूय इव ते तमः | य उ विद्यायां रताः ||9||
अभ्यासिती जे कां | अविद्या सदैव | गर्तेत पडती | अंधकारी ||17||
विद्याच केवळ | अभ्यासणाऱ्यास । त्यालाही अंधार । भेटेल ना ||18||
अन्यदेवाहुर्विद्यया | अन्यदाहुरविद्यया |
इति शुश्रुम धीराणाम् | ये नस्तद् विचचक्षिरे ||10||
विद्याभ्यासीयांचे | अपुले म्हणणें | अविद्यावाल्यांचे | आणीकचि ||19||
गूढार्थ तो घ्यावा | त्यांचेचकडून | धीरगंभीर जे | विचक्षणी ||20||
विद्यां चाविद्यां च | यस्तद्वेदोभयं सह |
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा | विद्ययामृतमश्नुते ||11||
समतोल त्याने | बरा साधीयेला | विद्या नि अविद्या | दोन्ही येतां ||21||
अविद्या जाणोनी | मृत्यूस तो लांघी | विद्येने साधतो | अमरत्व ||22||
अन्धं तमः प्रविशन्ति | येऽसंभूतिमुपासते |
ततो भूय इव ते तमः | य उ संभूत्यां रताः ||12||
निर्गुण ध्यानाने | ज्यांची उपासना | गर्तेत पडती | अंधकारी ||23||
सगुणपूजनी | सदा जे आसक्त | अंधारचि भेटे | त्यांना सुद्धा ||24||
अन्यदेवाहुः संभवात् | अन्यदाहुरसंभवात् |
इति शुश्रुम धीराणाम् | ये नस्तद् विचचक्षिरे ||13||
सगुणपूजक | म्हणतात कांही | निर्गुणाचा वाद | आणीकचि ||25||
सन्मार्ग तो घ्यावा | त्यांचेचकडून | धीरगंभीर जे | विचक्षणी ||26||
संभूतिं च विनाशं च | यस्तद्वेदोभयं सह |
विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा | संभूत्यामृतमश्नुते ||14||
सगुण तो जन्म | विनाशे निर्गुण | समजतां होते | बुद्धि स्थिर ||27||
विनाशाचे ज्ञाने | मृत्यूलाही जिंकी | संभूतीने लाहे | अमरत्व ||28||
हिरण्मयेन पात्रेण | सत्यस्यापि हितं मुखम् |
तत्त्वं पूषन्नपावृणु | सत्यधर्माय दृष्टये ||15||
हिरण्मयी पात्री | सदा झांकलेले | असते निखळ | सत्य जाणा ||29||
मोहाचे वेष्टण | सदा दिपवते | भेदूनी पहावा | सत्यधर्म ||30||
पूषन्नेकऋषे | यम सूर्य प्राजापत्य | व्यूह रश्मीन् समूह |
ततो  यत्ते रूपं कल्याणतमम् तत्ते पश्यामि |
योsसावसौ पुरुषः | सोsहमस्मि ||16||
अहो एक ऋषि | यम पोषकही | दर्शक रक्षक | विश्लेषक ||31||
कल्याणकारक | रूप तेज ज्याचे | मीच तो पुरुष | गमे मज ||32||
वायुरनिलममृतम् | अथेदं भस्मान्तं शरीरम् |
ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर | क्रतो स्मर कृतं स्मर ||17||
अनिलानलानो | वाहूनीया न्यावे | भस्मचि होणार | शरीर हें ||33||
काया-वाचा-मनें | भक्ति आचरतां | कर्म अग्निभूत | ॐ-काराने ||34||
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् | विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् |
युयोध्यस्मज् जुहराणमेनः | भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम ||18||
अग्नि गा विद्वाना | सन्मार्गाने नेई | विश्वातील सारे | जीवजंतू ||35||
तुझीया ज्वाळानी | पापे नाश करी | पुनःपुन्हा घेई | वन्दने ही ||36||
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते |
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ||
असे हेंही पूर्ण | असे तेंही पूर्ण | पूर्णातुनि पूर्ण | उपजते ||शान्ति-1||
पूर्णातुनि पूर्ण | जरि काढियेले | शेष जें राहतें | तेंही पूर्ण ||शान्ति-2||
||ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ||
सुशान्त सुशान्त सुशान्त हो s !!!
सस्नेहम्
अभ्यंकरकुलोत्पन्नः श्रीपादः ।
"श्रीपतेः पदयुगं स्मरणीयम् ।"

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